लड़ाकू विमान के इंजन बनाने में क्यों पीछे रह गया भारत
नई दिल्ली । लड़ाकू विमान यानी फाइटर जेट की असली ताकत उसके इंजन में होती है। इंजन तय करता हैं कि कोई विमान कितनी ऊँचाई तक जा सकता है, कितनी रफ्तार पकड़ सकता है और दुश्मन की पकड़ से कैसे बच सकता है। लेकिन इस तकनीक को विकसित करना दुनिया के सबसे मुश्किल और महंगे कामों में से एक है। अमेरिका, रूस फ्रांस और चीन इस क्षेत्र में बहुत आगे निकल चुके हैं लेकिन भारत अभी भी इस दौड़ में काफी पीछे है। भारत ने 1986 में अपने पहले स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन ‘कावेरी प्रोजेक्ट’ की शुरुआत की थी। लेकिन ये प्रोजेक्ट कई तकनीकी और वित्तीय कारणों से कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सका।
चीन ने इस क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश किया। वह रूस और अमेरिका की तकनीक को रिवर्स इंजीनियरिंग और साइबर जासूसी के ज़रिए हासिल करता रहा। चीन ने अपनी कोशिशों में निरंतरता बनाए रखी और आज वह डब्ल्यूएस-10 इंजन बड़े स्तर पर बना रहा है। इसके अलावा डब्ल्यूएस -15 इंजन को चीन जे-20 स्टील्थ फाइटर के लिए तैयार कर रहा है।
हाल के वर्षों में भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर नई इंजन तकनीक पर काम शुरू किया है। भारत का एएमसीए प्रोजेक्ट (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। अगर फ्रांस से तकनीकी साझेदारी सही दिशा में बढ़ती है, तब भारत भी 2035 तक अपने आधुनिक इंजन बना सकता है। लेकिन इसके लिए भारत को भारी निवेश करना होगा और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी तेजी लानी होगी। तकनीकी जानकारों का मानना है कि भारत अभी चीन से कम से कम 10 से 15 साल पीछे है।
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