उज्जैन के जागेश्वरधाम में फूलों से जैविक खाद बनाने की पहल
दमोह जिले सहित बुंदेलखंड के प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र श्री जागेश्वरधाम बांदकपुर में रहने वाले शिवम पाठक ने एक अभिनव पहल के तहत मंदिरों से निकलने वाले फूलों और पूजन सामग्री से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया शुरू की है। यह कदम पर्यावरण संरक्षण और जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। उन्होंने इसके बारे में उज्जैन से सीखा है।
आमतौर पर मंदिरों में पूजन सामग्री के रूप में उपयोग किए गए फूल, बेलपत्र, धतूरा, अकौआ आदि पूजा के बाद व्यर्थ समझकर फेंक दिए जाते हैं, जिससे स्वच्छता और पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है। इस समस्या के समाधान के लिए मंदिर की गौशाला में मंदिर बेस्ट मटेरियल रीसाइक्लिंग यूनिट स्थापित की गई है। यहां निर्माल्य को हाथों से छांटकर प्लास्टिक और अन्य अनुपयोगी तत्व अलग किए जाते हैं। इसके बाद इसे गौशाला से प्राप्त गोबर और गौमूत्र की सहायता से अपघटित कर शक्तिशाली जैविक खाद और वर्मीवॉश में परिवर्तित किया जाता है।
खाद बनाने की प्रक्रिया
शिवम ने बताया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से प्राकृतिक है और इसे बड़े स्तर के साथ-साथ घरों में भी अपनाया जा सकता है। खाद बनाने के लिए— 100 किलो गोबर में 30 से 40 किलो निर्माल्य मिलाया जाता है। इस मिश्रण को 7 दिनों तक हल्का पानी डालकर ठंडा किया जाता है। इसके बाद दो किलो केंचुएं इसमें छोड़े जाते हैं। लगभग 70 से 80 दिनों में केंचुए इस सामग्री को पूरी तरह खाकर जैविक खाद में बदल देते हैं। यह खाद सामान्य वर्मी कंपोस्ट की तुलना में 20 गुना अधिक प्रभावशाली होती है। इसे छोटे स्तर पर भी अपनाया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति एक किलो निर्माल्य और एक किलो गोबर को मिट्टी के मटके में डालकर उसमें केंचुए छोड़ दे, तो महज दो महीने में 1 से 1.5 किलो जैविक खाद तैयार हो सकती है। वहीं बड़े पैमाने पर एक वर्मीबेड में 700 किलो निर्माल्य और 700 किलो गोबर मिलाकर चार महीने में 800-900 किलो जैविक खाद और 50 लीटर वर्मीवॉश प्राप्त किया जा सकता है।
खाद की गुणवत्ता और उपयोग
इस जैविक खाद का पहला प्रयोग मंदिर उद्यान में किया गया, जिससे वहां लगे पौधों की वृद्धि और हरियाली में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। जैविक खाद को मंदिर परिसर से ही किसानों को 20-30 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जाता है। यह रासायनिक उर्वरकों की तुलना में अधिक पोषक, किफायती और पर्यावरण अनुकूल है। शिवम ने बताया कि निर्माल्य से खाद बनाने की यह प्रक्रिया सबसे पहले उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और देवास स्थित देवी माता मंदिर में अपनाई गई थी। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने तीन साल पहले जागेश्वरनाथ मंदिर में भी इसे शुरू किया, जो पूरी तरह सफल रही।
गोसंरक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता
इस परियोजना से होने वाली आय को मंदिर की गौशाला में गोसंरक्षण और गोसेवा के लिए खर्च किया जाता है। इससे गौवंश के चारे, देखभाल और चिकित्सा की बेहतर व्यवस्था की जाती है। इस पहल से एक संपूर्ण इको-सिस्टम तैयार होता है, जहां मंदिरों में व्यर्थ पड़े निर्माल्य को पुनः उपयोग में लाकर जैविक खाद में बदला जाता है। इससे किसानों को सस्ती और पोषक खाद मिलती है, गौशालाएं आत्मनिर्भर बनती हैं और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
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