चुनाव दबाव की रणनीति? सहयोगी दलों ने भाजपा को दिखाया 2027 का आईना
लखनऊ : दिल्ली में हुए निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में जिस तरह से पिछड़ी जातियों की राजनीति करने वाले राजग के सहयोगी दलों ने एकजुटता दिखाई है उससे साफ है कि आगामी चुनावों में भाजपा पर सीटों के बंटवारे का दबाव बढ़ेगा। सुभासपा अध्यक्ष ओपी राजभर और अपना दल (एस) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आशीष पटेल के तेवरों से साफ हो गया है कि इनकी असली मंशा अखिलेश यादव के पीडीए के तोड़ से ज्यादा अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव में भागीदारी बढ़ाने की है।
ऐसा नहीं है कि जाति आधारित राजनीति करने वाले नेताओं ने पिछड़ों के हक का मुद्दा पहली बार उठाया है। जातीय दलों के नेता हर बार चुनावी तैयारियों के दौरान इस तरह के मुद्दों को हवा देकर अपना राजनीति लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करते हैं। इससे उन्हें हर सरकार में प्रतिनिधित्व भी मिलता रहा है। ये अलग बात है कि एनडीए में शामिल होने के नाते अपना दल (एस), सुभासपा और निषाद पार्टी के तीनों नेता पिछड़ों की उपेक्षा के लिए विपक्ष को कोस रहे हैं, लेकिन असली निशाना बिहार के विधानसभा चुनाव के साथ ही यूपी में होने वाले आगामी पंचायत व विधानसभा चुनावों में सीटों की हिस्सेदारी पर है।
यूं ही नहीं दिल्ली में हुआ अधिवेशन
तीनों दलों के नेताओं ने एक स्वर से एकजुटता का दिखावा करते हुए जिस तरह से आरक्षण विरोधियों को सबक सिखाने की चेतावनी दी है, वह अनायास नहीं है। यूपी में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव से पहले नवंबर में बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी इनकी नजर है। अपना दल (एस) ने अब तक बिहार में चुनाव लड़ने का कोई संकेत नहीं दिया है, लेकिन सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद तो बिहार चुनाव में सीटों की मांग उठा भी चुके हैं। अधिवेशन में बिहार में निषाद पार्टी के चुनाव लड़ने के एलान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी एकजुटता के पीछे की मंशा आगामी चुनावों में सीटों के बंटवारे की ही है। माना जा रहा है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यह संदेश देने के लिए ही अधिवेशन दिल्ली में आयोजित किया गया।
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