बिहार में स्वास्थ्य विभाग का नया कदम, डॉक्टरों में हैरानी, निशांत कुमार का स्टाइल
पटना। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की नई सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय की कमान पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को सौंपे जाने के बाद से ही सियासी और प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज थी। कयास लगाए जा रहे थे कि क्या नए युवा मंत्री अपने पिता की सबसे महत्वाकांक्षी घोषणा—'सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक'—को लागू कर पाएंगे? हालांकि इस पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग में हाल ही में लिए गए फैसलों ने इसके साफ संकेत दे दिए हैं। जानकारों का मानना है कि निशांत कुमार अपने पिता के विजन को धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से जमीन पर उतारने का प्रयास कर रहे हैं। इसकी शुरुआत डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की बायोमेट्रिक हाजिरी से हो चुकी है।
डॉक्टरों की जवाबदेही तय: बायोमेट्रिक हाजिरी और नाइट ड्यूटी पर सख्ती
स्वास्थ्य विभाग अब सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठा रहा है। नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, सभी कर्मचारियों को निर्धारित ड्यूटी रोस्टर का पालन करना होगा और बायोमेट्रिक सिस्टम से हाजिरी लगानी होगी। विभाग का विशेष ध्यान रात्रिकालीन (नाइट शिफ्ट) सेवाओं पर है। रात के समय डॉक्टरों की मौजूदगी की कड़ी निगरानी की जा रही है, और वरिष्ठ चिकित्सकों को आपातकालीन सेवाओं (इमरजेंसी) की कमान संभालने का निर्देश दिया गया है ताकि मरीजों को 24 घंटे बेहतर इलाज मिल सके।
डॉक्टरों ने सरकार के सामने रखीं शर्तें, सुविधाओं और सुरक्षा की मांग को लेकर निकाला मार्च
इधर, निजी प्रैक्टिस पर संभावित रोक को देखते हुए डॉक्टरों के संगठन भी लामबंद होने लगे हैं। बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (भासा) के तत्वावधान में डॉक्टरों ने राजधानी में एक महासम्मेलन का आयोजन किया और अपनी मांगों के समर्थन में आईएमए हॉल से जेपी गोलंबर तक पैदल मार्च निकाला। चिकित्सकों का कहना है कि सरकार को पाबंदी लगाने से पहले डॉक्टरों की मूलभूत समस्याओं जैसे—सुरक्षित कार्य माहौल, अस्पतालों में पर्याप्त सुरक्षा गार्डों की तैनाती, डॉक्टरों के लिए आवास और प्रशासनिक पदों पर तैनात चिकित्सा पदाधिकारियों को वाहन की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए।
अस्पतालों को हाईटेक बनाने और 'नॉन-प्रैक्टिसिंग एलाउंस' देने की उठ रही मांग
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों और डॉक्टरों का एक वर्ग सरकार को अन्य राज्यों से सीख लेने की सलाह दे रहा है। पीएमसीएच के एक वरिष्ठ चिकित्सक के अनुसार, राजस्थान और पश्चिम बंगाल की तर्ज पर शर्तों के साथ निजी प्रैक्टिस की छूट दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि असली मुद्दा निजी प्रैक्टिस नहीं, बल्कि अस्पतालों में आधुनिक उपकरणों की कमी और डॉक्टरों के खाली पद हैं। वहीं, राज्य के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. अमूल्य सिंह ने निजी प्रैक्टिस पर रोक के विचार को सही ठहराते हुए कहा कि सरकार को इसके बदले सभी डॉक्टरों को 'नॉन-प्रैक्टिसिंग एलाउंस' (NPA) देना चाहिए, ताकि डॉक्टर बिना किसी वित्तीय नुकसान के अस्पतालों में अपना पूरा समय दे सकें।
'सात निश्चय-3' का हिस्सा है यह योजना, केमिस्ट एसोसिएशन ने लगाए गंभीर आरोप
गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 16 दिसंबर 2025 को 'सात निश्चय-3' की घोषणा की थी, जिसके तहत 'सुलभ स्वास्थ्य-सुरक्षित जीवन' का संकल्प लिया गया था। इसमें जिला अस्पतालों को सुपर स्पेशियलिटी सेंटर बनाने और डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस रोकने की नीति शामिल थी।
इस नीति का समर्थन करते हुए रिटेल केमिस्ट एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी संजय कुमार ने आरोप लगाया कि वर्तमान में कुछ सरकारी डॉक्टर अस्पतालों में बेहद कम समय देते हैं और अपने निजी क्लिनिकों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। दलालों के नेटवर्क के कारण गरीब मरीज परेशान होते हैं। उन्होंने कहा कि भारी-भरकम वेतन मिलने के बावजूद डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पतालों में गरीब मरीजों को उचित इलाज नहीं मिल पाता, इसलिए सरकार का यह कदम आम जनता के हित में बेहद जरूरी है।
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