कोरोना की उत्पत्ति पर नया विवाद, तुलसी गबार्ड के दावे ने मचाई हलचल
वाशिंगटन। चीन की विख्यात वुहान वायरोलॉजी प्रयोगशाला को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और सनसनीखेज अंतरराष्ट्रीय खुलासा हुआ है। यह वही प्रयोगशाला है जिसे वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी की उत्पत्ति का मुख्य केंद्र माना जाता रहा है। अब अमेरिकी खुफिया एजेंसी (ODNI) की निवर्तमान महानिदेशक तुलसी गबार्ड ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के शीर्ष चिकित्सा सलाहकार रहे डॉ. एंथनी फाउची ने इस चीनी प्रयोगशाला को गुप्त रूप से आर्थिक सहायता पहुंचाई थी। गबार्ड ने डोनाल्ड ट्रंप के खुफिया प्रमुख का पद छोड़ने के तुरंत बाद अपने कार्यकाल के अंतिम दिन कई ऐसे गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए हैं, जिन्होंने चिकित्सा जगत और वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है। इन अप्रत्याशित सरकारी कागजातों के जरिए सीधे डॉ. फाउची की भूमिका को गंभीर संदेहास्पद घेरे में खड़ा किया गया है।
करदाताओं के पैसों से चमगादड़ वायरस पर जानलेवा शोध और वैक्सीन बाजार का खेल
सार्वजनिक किए गए आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, 85 वर्षीय डॉ. एंथनी फाउची ने अमेरिकी नागरिकों के टैक्स के पैसों का दुरुपयोग करते हुए वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को लाखों डॉलर का गुप्त अनुदान दिया था। इस भारी-भरकम अमेरिकी फंडिंग का मुख्य उद्देश्य वुहान की लैब में चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोना वायरस पर अत्यधिक जोखिम भरी 'गेन-ऑफ-फंक्शन' रिसर्च को अंजाम देना था। वैज्ञानिक भाषा में इस प्रकार के प्रयोगों के माध्यम से प्राकृतिक वायरसों को प्रयोगशाला के भीतर कृत्रिम रूप से कहीं अधिक संक्रामक, घातक और जानलेवा बनाया जाता है। राष्ट्रीय संक्रामक रोग संस्थान (NIAID) के प्रमुख के रूप में 38 वर्षों तक काम करने वाले डॉ. फाउची पर आरोप है कि उन्होंने ट्रिलियन डॉलर के 'यूनिवर्सल वैक्सीन' मार्केट को खड़ा करने और दवा निर्माता कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए इस खतरनाक रिसर्च को जानबूझकर बढ़ावा दिया।
इंटेलिजेंस कम्युनिटी पर दबाव और फर्जी रिसर्च पेपर के जरिए सच को दबाने की साजिश
खुफिया रिपोर्ट में यह सनसनीखेज आरोप भी लगाया गया है कि डॉ. फाउची ने प्रशासनिक तंत्र में बैठे कुछ चुनिंदा अधिकारियों के साथ साठगांठ कर वायरस के लैब से लीक होने की थ्योरी को पूरी तरह दफन करने का प्रयास किया। साक्ष्यों के मुताबिक, उन्होंने अपने पसंदीदा वैज्ञानिकों की एक विशेष टीम तैयार की और अमेरिकी खुफिया समुदाय पर यह मनगढ़ंत नैरेटिव स्वीकार करने का कड़ा दबाव बनाया कि कोविड-19 पूरी तरह से एक प्राकृतिक आपदा थी जो जानवरों के जरिए इंसानों में फैली। इसके लिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत 'सर्कुलर रिपोर्टिंग लूप' का सहारा लिया गया, जिसके तहत फाउची के ही विभाग से आर्थिक लाभ पाने वाले विशेषज्ञों को खुफिया एजेंसियों को सलाह देने के लिए भेजा जाता था और बाद में उसी सरकारी इनपुट को 'वैज्ञानिक आम सहमति' का नाम देकर दुनिया के सामने परोसा जाता था ताकि कोई भी वुहान लैब पर शक न कर सके।
संसदीय समिति के सामने झूठी गवाही और सच बोलने वाले व्हिसलब्लोअर्स का उत्पीड़न
इन दस्तावेजों में सबसे गंभीर और दंडात्मक आरोप डॉ. फाउची द्वारा अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की लोक सुनवाई के दौरान झूठी शपथ लेने को लेकर लगा है। जून 2024 में हुई एक कड़े संसदीय कड़े इम्तिहान के दौरान जब उनसे पूछा गया था कि क्या उन्होंने कभी सीआईए, एफबीआई या अन्य खुफिया जांच एजेंसियों से इस वायरल रिसर्च पर गुप्त संवाद किया था, तो उन्होंने साफ मुकरते हुए इस बात से पूरी तरह इनकार कर दिया था, जबकि नए दस्तावेज इसके ठीक विपरीत गवाही दे रहे हैं। तुलसी गबार्ड ने इस पूरे घटनाक्रम को 'डीप स्टेट' की एक खतरनाक और अलोकतांत्रिक साजिश करार देते हुए कहा कि जिस वायरस ने करोड़ों वैश्विक नागरिकों को असहनीय दर्द और मौत दी, उसकी सच्चाई जानने का हक पूरी दुनिया को है। रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि जिन साहसी खुफिया विश्लेषकों और व्हिसलब्लोअर्स ने फाउची के इस निष्कर्ष को चुनौती देने की कोशिश की, उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर उनके करियर को तबाह कर दिया गया ताकि असहमति की हर आवाज को दबाया जा सके।
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