नाम बदलने की राजनीति तेज, इस्लामपुर को श्रीरामपुर बनाने पर BJP-कांग्रेस आमने-सामने
झुंझुनू। राजस्थान के झुंझुनू जिले में स्थित करीब 400 वर्ष पुराने ऐतिहासिक गांव 'इस्लामपुर' का नाम परिवर्तित कर 'श्रीरामपुर' किए जाने की प्रशासनिक कवायद ने राज्य के सियासी गलियारों में भारी उबाल ला दिया है। इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के नेता आमने-सामने आ गए हैं। सत्ताधारी भाजपा का स्पष्ट आरोप है कि कांग्रेस पार्टी केवल तुष्टिकरण और भगवान राम के नाम से द्वेष के कारण इस बदलाव का विरोध कर रही है। भाजपा के प्रखर विधायक बालमुकुंद आचार्य ने मुख्य विपक्षी दल पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस का इतिहास हमेशा से राम विरोधी रहा है; उसने पहले राम मंदिर के निर्माण में अड़ंगे लगाए, प्रभु श्रीराम के वजूद पर सवाल खड़े किए और अब राम के नाम पर एक गांव का नामकरण किए जाने से उसे आपत्ति हो रही है। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से पूछा है कि आखिर उन्हें 'श्रीरामपुर' नाम से इतनी चिढ़ क्यों है।
कांग्रेस का पलटवार: नाम बदलने की नीति को बताया ध्यान भटकाने वाला हथकंडा
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भाजपा के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे केवल चुनावी लाभ लेने का एक जरिया करार दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने इस कदम को फिजूल की राजनीति बताते हुए सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि सत्तापक्ष को नाम बदलने के बजाय जनता को यह जवाब देना चाहिए कि वह युवाओं को रोजगार और आम लोगों को महंगाई से राहत कब दिलाएगी। खाचरियावास ने तर्क दिया कि क्या महज किसी गांव का नाम 'इस्लामपुर' से बदलकर 'श्रीरामपुर' कर देने से वहां के निवासियों को भुखमरी, बेरोजगारी, बिजली-पानी की किल्लत और बदहाल सड़कों जैसी बुनियादी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा बुनियादी और जरूरी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए हमेशा नफरत की राजनीति का सहारा लेती है।
साढ़े चार सौ साल पुराना इतिहास और सांप्रदायिक सौहार्द की मजबूत मिसाल
इस विवाद के केंद्र में मौजूद इस्लामपुर गांव का अपना एक गौरवशाली और साझा सांस्कृतिक इतिहास रहा है। ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक, इस गांव में राजपूत और मुस्लिम समुदाय के लोग सदियों से बेहद प्रेम और शांति के साथ निवास करते आ रहे हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार, लगभग चार शताब्दी पूर्व स्थानीय राजपूत जागीरदारों द्वारा सहर्ष दान में दी गई भूमि पर ही यहां मुस्लिम परिवारों को बसाया गया था। यह परंपरा दोनों संस्कृतियों के बीच अटूट विश्वास की गवाह रही है।
गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक पर राजनीतिक रस्साकशी जारी
स्थानीय इतिहासकारों और बुजुर्गों के अनुसार, अतीत में यहां के पठान लड़ाके राजपूत रियासतों और राजाओं की सेना में शामिल होकर उनके मान-सम्मान के लिए युद्ध के मैदान में अपनी जान की बाजी लगाते थे। यही वजह है कि इस्लामपुर गांव को समूचे शेखावाटी अंचल में पारंपरिक रूप से हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहजीब की एक बेमिसाल धरोहर माना जाता है। बहरहाल, अब इस ऐतिहासिक गांव के नामकरण को बदलने की चल रही तैयारियों के बीच यह पूरा प्रकरण एक प्रशासनिक प्रक्रिया से कहीं आगे बढ़कर राज्य की राजनीति का एक बेहद ज्वलंत और पेचीदा विषय बन चुका है, जिस पर दोनों दलों में खींचतान जारी है।
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