अरब की कौन हैं वो 3 देवियां, जिनकी होती थी पूजा, मक्का के काबा में थीं 360 मूर्तियां, लेकिन सब कैसे हो गईं खत्म
अरब देशों में इस्लाम के आगमन से पहले मूर्ति पूजा की जाती थी. उस समय के अरब प्रायद्वीप में मक्का, मदीना और आसपास के क्षेत्र शामिल थे. उसमें 3 देवियां प्रसिद्ध थीं, जिनको उस समय के लोग ईश्वर की बेटियां मानते थे. इनके पास कुछ शक्तियां थीं और इनको ईश्वर की प्राप्ति का माध्यम माना गया. उस समय में भी मक्का का काबा एक बड़ा धार्मिक केंद्र हुआ करता था, जहां 360 मूर्तियां थीं, जिसमें सबसे बड़ा देवता हुबल था. वहां पर हर जनजाति की अपनी एक मूर्ति थी.
अरब की 3 देवियां और उनकी शक्तियां
प्राचीन अरब क्षेत्र की 3 प्रमुख देवियों में अल-लात, अल-उज्जा और मनात थीं. पत्थर के रूप में उनके प्रतीक होते थे. इनके पास सुख, समृद्धि, वर्षा, शक्ति, प्रेम, भाग्य, मृत्यु आदि की शक्तियां थीं. कुरान के सूरा अन-नज्म में भी इन देवियों का जिक्र है.
अल-लात: देवी अल-लात को अरब के लोग धरती की देवी या प्रकृति की माता कहते थे. मक्का के पास ताइफ में उनका मंदिर था, जिसमें सफेद पत्थर को उनके प्रतीक के रूप पूजा जाता था. उनको वर्षा, खेती, सुख, समृद्धि की देवी कहा जाता था.
अल-उज्जा: अल-उज्जा दूसरी प्रमुख देवी थीं. इनको युद्ध, शक्ति, प्रेम और सौंदर्य की देवी माना जाता था. उस समय की कुरैश जनजाति के लोग जब युद्ध के लिए जाते थे, तो देवी अल-उज्जा का अशीर्वाद लेते थे. मक्का के नखला घाटी में अल-उज्जा की पूजा 3 पवित्र बबूल के पेड़ों और चट्टान के रूप में होती थी. उस समय के लोग अल-उज्जा को सुबह के तारे से भी जोड़कर देखते थे.
मनात: देवी मनात अरब की तीसरी प्रमुख देवी थीं. उनको मृत्यु, भाग्य और समय की देवी मानते थे. लोगों की मान्यता थी कि इस देवी के हाथों में ही इंसान की किस्मत और जीवन-मृत्यु था. वे ही लोगों की मृत्यु तय करती थीं. मक्का और मदीना के बीच कुदैद समुद्री तट पर मनात देवी का मंदिर था. लोग एक काले पत्थर को मनात देवी के प्रतीक के रूप में पूजते थे. मदीना की औस और खजराज जनजातियां विशेष रूप से पूजती थीं.
काबा में थीं 360 मूर्तियां
प्राचीन अरब क्षेत्र में कई जनजातियां थीं, जिसके सदस्य काबा क्षेत्र का दौरा धार्मिक और व्यापारिक दृष्टि से करते थे. काबा में 360 मूर्तियां रखी गई थीं, जो किसी न किसी एक जनजाति से संबंधित थीं. इसको रखने का उद्देश्य यह भी था कि व्यापार और पूजा के लिए पूरे अरब के लोग वहां आ सकें. उनमें मुख्य देवता हुबल थे, जो युद्ध और वर्षा के देवता थे. इस्लाम से पूर्व में जब मूर्तियों की पूजा होती थी, उस काल को जाहिलिया का काल कहा जाता है.
3 देवियों और मूर्तियों का अंत
पैगंबर मोहम्मद और उनके अनुयायियों ने जब मक्का पर जीत हासिल की तो उन्होंने काबा से सभी 360 मूर्तियों को हटा दिया और 3 देवियों के मंदिरों एवं प्रतीकों को खत्म कर दिया. इस्लाम के आगमन के साथ अरब में बहुदेववाद खत्म हो गया और एकेश्वरवाद यानि एक अल्लाह की इबादत शुरू हुई.
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