DMF राशि के उपयोग पर जांच की मांग, प्रोजेक्ट्स में पारदर्शिता पर सवाल
रायपुर: छत्तीसगढ़ में 18 हजार करोड़ के DMF प्रोजेक्ट्स पर उठे सवाल, पारदर्शिता को लेकर प्रशासन घेरे में
रायपुर: छत्तीसगढ़ में जिला खनिज न्यास (DMF) के तहत होने वाले विकास कार्यों को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। खनिज संपदा से भरपूर इस राज्य में खनन प्रभावित क्षेत्रों के उद्धार के लिए अरबों रुपये का बजट आवंटित किया गया है, लेकिन इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन में बरती जा रही अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी ने सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
18,234 करोड़ का बजट, पर हकीकत कुछ और
आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 33 जिलों में DMF के माध्यम से 18,234 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली 1,13,394 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। हालांकि, जमीनी स्तर पर स्थिति संतोषजनक नहीं दिख रही है:
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अधूरे कार्य: करीब 4,376 करोड़ रुपये की 20,740 परियोजनाएं अभी भी अधूरी हैं।
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शुरू न होने वाले प्रोजेक्ट: 3,946 ऐसी योजनाएं हैं जिन्हें मंजूरी तो मिल गई, लेकिन 932 करोड़ रुपये का बजट होने के बावजूद इनका काम शुरू तक नहीं हो पाया।
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निरस्त कार्य: लगभग 2,026 करोड़ रुपये के 9,767 प्रोजेक्ट्स को किन्हीं कारणों से रद्द कर दिया गया है।
फंड के उपयोग और ऑडिट पर संशय
खनिज क्षेत्रों से हर साल करोड़ों का राजस्व DMF फंड में जमा होता है। नियम के मुताबिक, इस राशि का उपयोग स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए होना चाहिए। लेकिन कई जिलों ने अब तक अपनी ऑडिट रिपोर्ट और वार्षिक प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि करोड़ों की यह राशि वास्तव में विकास पर खर्च हुई या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।
जांच एजेंसियों की रडार पर DMF
DMF फंड में कथित बंदरबांट और अनियमितताओं की गंभीरता को देखते हुए ED (प्रवर्तन निदेशालय) और CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं। जांच के दौरान कई रसूखदार अधिकारियों और बिचौलियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है, जिसमें गिरफ्तारियां भी शामिल हैं। इन जांचों ने यह संकेत दिया है कि फंड के उपयोग में बड़े स्तर पर सांठगांठ की गई है।
केंद्र के नियमों की अनदेखी
केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष DMF के पारदर्शी उपयोग के लिए सख्त निर्देश जारी किए थे, जिसमें सभी परियोजनाओं की जानकारी ऑनलाइन पोर्टल पर साझा करना अनिवार्य था। रायपुर सहित कई जिलों में इन नियमों की अनदेखी की जा रही है, जिससे सूचनाएं छिपाने और गड़बड़ियों को दबाने की आशंका गहरा गई है।
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