बंगाल में सियासी संग्राम: ‘जय महाकाली’ बनाम ‘जय श्रीराम’ के बीच बढ़ी टकराहट
नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति वर्तमान में अपने इतिहास के सबसे निर्णायक और अस्तित्ववादी दौर से गुजर रही है। 2026 के इस चुनावी समर में मुद्दा केवल सत्ता का नहीं, बल्कि 'अस्मिता' और 'विचारधारा' के वर्चस्व का है। हुगली नदी के ऊपर शोर भले ही रैलियों और नारों का हो, लेकिन पानी के नीचे 'हिंदुत्व' का एक ऐसा अदृश्य प्रवाह (Under-current) सक्रिय है, जो किसी भी समय ममता बनर्जी के अभेद्य किले की नींव हिला सकता है।
1. सांस्कृतिक चेतना बनाम सेक्युलरिज्म: मोदी का 'मंदिर कार्ड'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दक्षिणेश्वर, बेलूर मठ और कालीघाट जैसे पवित्र स्थलों पर उपस्थिति महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक गहरा रणनीतिक संदेश है।
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नया विमर्श: मोदी ने उन सांस्कृतिक प्रतीकों को मुख्यधारा में ला खड़ा किया है, जिन्हें दशकों तक 'सेक्युलरिज्म' के नाम पर हाशिए पर रखा गया था।
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नारों का संगम: बंगाल की गलियों में अब 'जय माँ काली' के पारंपरिक जयघोष के साथ 'जय श्रीराम' का उद्घोष न केवल गूँज रहा है, बल्कि यह एक नई राजनीतिक पहचान बन चुका है। कोलकाता की सड़कों पर उमड़ता जनसैलाब इस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का जीवंत प्रमाण है।
2. शाह की रणनीति और बंसल का 'बूथ-तंत्र'
भाजपा ने इस बार अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली से रिमोट कंट्रोल चलाने के बजाय खुद कोलकाता में डेरा डाल दिया है।
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बंसल का कौशल: उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत के शिल्पकार रहे सुनील बंसल अब बंगाल में 'माइक्रो-मैनेजमेंट' देख रहे हैं। वे मुकुल राय की कमी को अपनी सूक्ष्म संगठनात्मक दृष्टि से भर रहे हैं।
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सुरक्षा का भरोसा: शाह का यह वादा कि "नतीजों के 60 दिन बाद तक केंद्रीय बल बंगाल में रहेंगे", उन मतदाताओं के लिए एक सुरक्षा कवच (Security Blanket) की तरह है जो 2021 की हिंसा के बाद भयभीत थे।
3. ममता का पलटवार: 'शक्ति उपासना' और 'बंगाली अस्मिता'
तृणमूल कांग्रेस की कमान खुद ममता बनर्जी ने संभाली है, जो भाजपा के 'हिंदुत्व' को बंगाल की अपनी 'शक्ति परंपरा' से काट रही हैं।
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अस्मिता की राजनीति: ममता इसे 'बाहरी बनाम भीतरी' की लड़ाई बताकर बंगाली भावनाओं को उद्वेलित कर रही हैं। कालीघाट और शीतला मंदिर के जरिए वे संदेश दे रही हैं कि बंगाल की संस्कृति को बाहरी चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
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अभिषेक बनर्जी का युवा जोश: टीएमसी की युवा वाहिनी का नेतृत्व कर रहे अभिषेक बनर्जी ने फुटबॉल की शब्दावली (Red Card) का उपयोग कर युवाओं को जोड़ा है। सयानी घोष जैसे वक्ता चुनावी विमर्श को 'मंदिर' से खींचकर केंद्र द्वारा बंगाल के बकाया फंड और हक की लड़ाई पर ले आए हैं।
4. 142 सीटों का गणित: हृदय-प्रदेश में सेंधमारी की कोशिश
अगले चरणों में जिन 142 सीटों पर मतदान होना है, वे तृणमूल का 'गढ़' मानी जाती हैं। पिछले चुनाव में भाजपा यहाँ महज 18 सीटों पर सिमट गई थी। लेकिन इस बार भ्रष्टाचार, 'कट-मनी' और स्थानीय प्रताड़ना के मुद्दे टीएमसी के लिए चुनौती बने हुए हैं।
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