भाजपा में नहीं टिक पाए पूर्व मंत्री महेंद्रजीत मालवीया, सियासी वजहें आईं सामने
जयपुर|राजस्थान की सियासत में एक बार फिर वही पुरानी कहानी, लेकिन किरदार बेहद खास। आदिवासी अंचल के कद्दावर नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीया—जो कभी कांग्रेस के मजबूत स्तंभ माने जाते थे, फिर अचानक बीजेपी की ओर चले गए—अब एक बार फिर “घर वापसी” की तैयारी में हैं। महज दो साल पहले जिस भाजपा को उन्होंने नई राजनीतिक मंज़िल माना था, उससे अब उनका मोहभंग हो चुका है।दक्षिण राजस्थान की राजनीति में यह घटनाक्रम मामूली नहीं है। बांसवाड़ा-डूंगरपुर जैसे आदिवासी बहुल इलाके में मालवीया का नाम आज भी बड़े जनाधार के साथ लिया जाता है। ऐसे में उनका दोबारा कांग्रेस की ओर झुकाव, सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर रहा है।
कांग्रेस से बीजेपी और अब फिर कांग्रेस की राह
महेंद्रजीत सिंह मालवीया ने हाल ही में कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जुली से मुलाकात की। इस मुलाकात को औपचारिक शिष्टाचार से कहीं ज्यादा अहम माना जा रहा है। साफ संकेत हैं कि मालवीया कांग्रेस में दोबारा शामिल होने का मन बना चुके हैं।हालांकि अभी तक उन्होंने औपचारिक सदस्यता नहीं ली है, लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से मुलाकात के बाद सियासी संदेश साफ है—बीजेपी से उनका मन भर चुका है।
कांग्रेस ने बनाया, कांग्रेस ने आगे बढ़ाया
महेंद्रजीत सिंह मालवीया का राजनीतिक कद कांग्रेस की देन माना जाता है। वर्ष 1998 में कांग्रेस ने उन्हें बांसवाड़ा लोकसभा सीट से मैदान में उतारा और वे जीत दर्ज कर सांसद बने। इसके बाद विधानसभा राजनीति में कदम रखा।हालांकि 2003 में बागीदौरा विधानसभा सीट से उन्हें हार मिली, लेकिन यह हार उनके राजनीतिक सफर का ब्रेक नहीं बन सकी। 2008 से 2023 तक वे लगातार चार बार बागीदौरा से विधायक चुने गए।
2008 में 44,689 मतों से बड़ी जीत
2013 में दूसरी जीत
2018 में तीसरी बार विधायक
2023 में चौथी बार शानदार विजय
यही नहीं, उनकी पत्नी रेशमा मालवीया भी पंचायत राजनीति में सक्रिय रहीं और बांसवाड़ा की जिला प्रमुख बनीं। यानी पूरा परिवार कांग्रेस की राजनीति में गहराई से जुड़ा रहा।
नेता प्रतिपक्ष की आस और नाराजगी
दिसंबर 2023 में कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में हार मिली और पार्टी विपक्ष में बैठी। इसी दौरान नेता प्रतिपक्ष के नाम को लेकर चर्चा तेज हुई। माना जाता है कि महेंद्रजीत सिंह मालवीया खुद को इस पद का दावेदार मान रहे थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने टीकाराम जुली को नेता प्रतिपक्ष बना दिया।यहीं से कांग्रेस और मालवीया के बीच दूरी बढ़ी। नाराजगी इतनी बढ़ी कि मार्च 2024 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया।
बीजेपी में एंट्री, लेकिन दांव पड़ा उलटा
बीजेपी में शामिल होते ही पार्टी ने उन्हें डूंगरपुर-बांसवाड़ा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। सोचा गया कि आदिवासी चेहरा और लंबा अनुभव भाजपा के काम आएगा, लेकिन नतीजा इसके उलट रहा।लोकसभा चुनाव में भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के राजकुमार रोत ने उन्हें करीब ढाई लाख वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। यह हार सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि सियासी संदेश भी थी—आदिवासी अंचल में समीकरण बदल चुके हैं।
हार के बाद बढ़ी दूरी
लोकसभा में करारी हार और पार्टी में अपेक्षित भूमिका न मिलने से मालवीया बीजेपी से निराश होते चले गए। वहीं, बागीदौरा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी कांग्रेस को फायदा नहीं मिला और बीएपी के जयकृष्ण पटेल विधायक बन गए।अब दो साल के भीतर ही महेंद्रजीत सिंह मालवीया ने यह साफ कर दिया है कि बीजेपी उनके राजनीतिक भविष्य की जमीन नहीं बन पाई।
कांग्रेस के लिए मौका, बीजेपी के लिए झटका
मालवीया की संभावित घर वापसी कांग्रेस के लिए आदिवासी अंचल में नई ऊर्जा ला सकती है, जबकि बीजेपी के लिए यह एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।अब सवाल सिर्फ इतना है—क्या कांग्रेस इस बार महेंद्रजीत सिंह मालवीया को वह सम्मान और भूमिका दे पाएगी, जिसकी तलाश में वे पार्टी छोड़कर गए थे? और क्या मालवीया फिर से दक्षिण राजस्थान की राजनीति में अपना पुराना दबदबा कायम कर पाएंगे?
राजस्थान की सियासत में इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में मिल जाएगा।
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