बेटी अनजान के बहकावे में क्यों आई? मोहन भागवत ने बताया 'लव जिहाद' से बचने का अचूक पारिवारिक मंत्र
Bhopal News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि लव-जिहाद जैसी घटनाओं को रोकने के लिए सबसे पहले प्रयास अपने घर और परिवार से शुरू करने होंगे. यह समझना जरूरी है कि हमारे परिवार की बेटियां किसी अनजान के प्रभाव में कैसे आ जाती हैं, और इसका एक बड़ा कारण परिवार के भीतर संवाद की कमी है. उन्होंने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए तीन स्तरों पर काम करना होगा. भागवत ने कहा कि परिवार में लगातार संवाद बनाए रखना, बेटियों को सतर्कता और आत्मरक्षा के संस्कार देना, और ऐसे अपराध करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना.
समाज और संस्कृति की रक्षा में महिलाओं की भूमिका अहम – संघ प्रमुख
भागवत ने यह बातें शनिवार शाम भोपाल में आयोजित सामाजिक सद्भाव और स्त्री शक्ति संवाद कार्यक्रम के दौरान कहीं. उन्होंने कहा कि समाज और संस्कृति की रक्षा में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय रही है. उन्होंने यह भी कहा कि समाज में भ्रम फैलाकर जनजातीय और अन्य वर्गों को अलग बताने की कोशिश की जाती रही है, जबकि सच्चाई यह है कि हजारों वर्षों से अखंड भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक ही है.
उन्होंने कहा कि सद्भाव केवल संकट के समय नहीं, बल्कि हर समय बनाए रखना चाहिए. एक-दूसरे से मिलना, बातचीत करना और परस्पर कार्यों को समझना सद्भावना की पहली शर्त है. समाज के अच्छे कार्यों से प्रेरणा लेनी चाहिए और ऐसी सद्भाव बैठकों को जिला, तहसील, ब्लॉक और गांव स्तर तक हर वर्ष आयोजित किया जाना चाहिए. यह किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है.
हिंदू कोई नाम नहीं, बल्कि एक जीवन स्वभाव है – मोहन भागवत
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू कोई नाम नहीं, बल्कि एक जीवन स्वभाव है. जब तक हिंदू पहचान है, तब तक जातियों का अस्तित्व है. जैसे ही यह स्वभाव छूटता है, जातिगत पहचान भी समाप्त हो जाती है. उन्होंने समाज की तुलना शरीर से करते हुए कहा कि जैसे शरीर के सभी अंग मिलकर काम करते हैं, वैसे ही समाज को भी संगठित और मजबूत रहना होगा, ताकि कमजोर वर्गों को सहयोग के जरिए सशक्त बनाया जा सके.
उन्होंने यह भी कहा कि देश और समाज के अस्तित्व से ही सामाजिक संरचनाएं टिकती हैं. सामाजिक सद्भाव कोई नया विचार नहीं, बल्कि समाज की स्वाभाविक प्रवृत्ति है. कानून केवल नियंत्रण कर सकता है, लेकिन समाज को जोड़कर रखने का काम सद्भावना ही करती है. विविधता के बावजूद एकता ही हमारी पहचान है. बाहरी रूप से भिन्न दिखने के बावजूद राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के स्तर पर हम सभी एक हैं, और इसी विविधता में एकता को स्वीकार करना हिंदू समाज की विशेषता है.
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