ऑपरेशन सिंदूर: भारतीय नौसेना की रणनीतिक जीत का बड़ा राज खुला
पड़ोसी देशों के साथ भारत की सामरिक चुनौती लगातार बनी हुई है. सरकार इस लगातार मजबूत बनाने में लगी है. साथ ही समुद्री सीमाओं पर भी भारतीय नौसेना की नजर है. नौसेना धीरे-धीरे हिंद महासागर की महाशक्ति बनती जा रही है. पाकिस्तान के खिलाफ मई में चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी तत्परता का जबरदस्त प्रदर्शन किया था. वाइस एडमिरल ने बताया कि संघर्ष शुरू होने के बाद 15 मिग-29K एयरक्राफ्ट के जरिए पाकिस्तानी नौसेना को उनके ही क्षेत्र में घेर लिया गया था.
मध्य प्रदेश के डॉ. आंबेडकर नगर स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित त्रि-सेवा संवाद रण संवाद-2025 में डिप्टी चीफ ऑफ नेवल स्टाफ (DCNS) वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने नौसेना की तेज और निर्णायक कार्रवाई के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नौसेना पूरी तरह युद्ध मोड में आ गई थी. ऑपरेशन सिंदूर 7 से 10 मई के बीच हुए पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में चलाया गया था.
INS विक्रांत बना ऑपरेशन की रीढ़
दरअसल, उस समय भारतीय नौसेना का बड़ा युद्धाभ्यास TROPEX पहले से ही चल रहा था और कई युद्धपोत पश्चिमी समुद्र तट पर तैनात थे. हमले की खबर मिलते ही महज 96 घंटे में ही सभी ऑपरेशनल जहाज समुद्र में तैनात कर दिए गए. गोला-बारूद और जरूरी चीजों से लैस कर जहाजों और पनडुब्बियों को युद्ध के लिए तैयार किया गया.
इस पूरे ऑपरेशन का केंद्र था भारत का स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत, जिस पर 15 मिग-29K लड़ाकू विमान तैनात किए गए थे. विक्रांत के साथ विध्वंसक (डिस्ट्रॉयर), फ्रिगेट और पनडुब्बियों की टास्क फोर्स बनाई गई. इस ताकतवर तैनाती की वजह से ही कराची के दक्षिण में अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में पाकिस्तान नौसेना अपने बंदरगाहों तक सीमित होकर रह गए.
पाक नौसेना ‘तट से बंधी’ रह गई
वाइस एडमिरल सोबती ने कहा, हमारा मकसद साफ था, एक फॉरवर्ड और डिटरेंट पोस्चर बनाना ताकि पाकिस्तानी नौसेना न हमारी तटरेखा को खतरा दे सके और न ही हमारे व्यापारिक रास्तों तथा समुद्री आर्थिक लाइनों को.
भारतीय नौसेना की इस मजबूत तैनाती के बाद पाकिस्तानी नौसेना समुद्र में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा पाई और अपने तट तक ही सीमित होकर रह गई. भारतीय नौसेना ने बिना सीधी लड़ाई किए ही उसे पूरी तरह दबाव में ला दिया.
‘नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर’
ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि भारतीय नौसेना सैटेलाइट, ड्रोन, तटीय रडार और लंबी दूरी की मिसाइलों की मदद से दुश्मन को उसकी सीमा में ही रोक सकती है. इसे नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर कहा जाता है, जहां बिना सीमा पार किए ही रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली जाती है.
वाइस एडमिरल सोबती ने यह भी कहा कि इस ऑपरेशन से हमें कई सबक भी मिले हैं. इसमें सबसे अहम है, लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता बढ़ाना, ड्रोन और काउंटर- ड्रोन सिस्टम्स को और मजबूत करना.
साथ ही उन्होंने बताया कि आजकल कम कीमत वाले ड्रोन बड़े खतरे बन रहे हैं, जैसे हूती विद्रोहियों ने रेड सी और अदन की खाड़ी में किया. इसलिए नौसेना को ऐसे सिस्टम चाहिए जो कम खर्च में इन ड्रोन को नष्ट कर सकें.
एक और चुनौती है काउंटर-ड्रोन जैमर्स की वजह से नौसेना के रडार सिस्टम पर असर पड़ना. जहाज पहले से ही तकनीकी उपकरणों से भरे होते हैं, ऐसे में और जैमर लगाने से इलेक्ट्रॉनिक दिक्कतें आ सकती हैं. इसलिए इसके लिए बेहतर मैनेजमेंट और सिस्टम इंटीग्रेशन भी ज़रूरी है.
उनका कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि भारतीय नौसेना न सिर्फ तेजी से युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, बल्कि दुश्मन को उसके तट तक बांधकर, बिना लड़ाई किए ही रणनीतिक बढ़त हासिल कर सकती है.
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