एक ने नेत्रदान किया दो लोगों को मिली आंख की रोशनी
पटना। अब वो अंधेरी दुनिया से लौट आए हैं। सबकुछ बेहतर दिख रहा है और नेत्र देने वाले को धन्यवाद दे रहे हैं। पटना एम्स में नेत्र बैंक बनने के 10 माह बाद किसी व्यक्ति ने नेत्रदान दिया। इसके बाद पहली बार कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया गया। इससे लोगों को रोशनी वापस लौटी। इस ट्रांसप्लांट को नेत्र विभाग के हेड डॉ अमित राज के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने पूरा किया। इस मौके पर डॉ। अमित ने बताया कि एम्स पटना में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से पीडित 100 से अधिक मरीज पंजीकृत हैं लेकिन डोनर नहीं मिलने के कारण सभी इंतजार कर रहे हैं।
पटना एम्स में पहली बार कॉर्निया ट्रांसप्लांट कर दुल्हिन बजार के 55 वर्षीय पुरुष और संपतचक की 30 वर्षीया महिला की आंखों की रोशनी लौटाई गई। एक ट्रांसप्लांट में 45 मिनट से एक घंटे का समय लगता है। बता दें कि 55 वर्षीय व्यक्ति की आंखों का कॉर्निया 14 वर्ष की उम्र में चोट लगने की वजह से सफेद और धुंधला हो चुका था। एम्स पटना में नेत्र विशेषज्ञों की टीम ने पहले मोतियाबिंद की सर्जरी की और कॉर्नियल ट्रांसप्लांट सर्जरी से नया कॉर्निया प्रत्यारोपित किया। अब इस मरीज को पहले की तरफ साफ-साफ दिखाई दे रहा है।
दूसरी मरीज, 30 वर्षीया महिला पटना के संपतचक की रहने वाली हैं। कुछ समय पहले उनकी आंखों में इन्फेक्शन हुआ था। यह इतनी तेजी से फैला कि देखते ही देखते इंफेक्शन एक आंख की कॉर्निया को पिघलाने लगा। धीरे-धीरे उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह से खत्म हो गई। चिकित्सीय केराटोप्लास्टी के माध्यम से नया कार्निया प्रत्यारोपित किया गया और संक्रमण फैलने से रोका गया।
इन दोनों लोगों की रोशनी तभी लौट पाई जब एक व्यक्ति ने नेत्रदान किया। जमीनी हकीकत यह है कि लोग नेत्रदान के प्रति जागरूक नहीं हैं। इस वजह से कॉर्निया नहीं मिल पा रहा है। इसके इंतजार में पटना एम्स में 100 से अधिक मरीज पंजीकृत हैं, वे लंबे समय से कॉर्निया ट्रासप्लाट का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश, कॉर्निया डोनर की संख्या बिल्कुल सीमित है। इसीलिए नेत्रदान करना बेहद जरूरी है। नेत्रदान के लिए पटना एम्स ने नंबर जारी किया है। डॉक्टरों ने बताया कि एड्स, हेपेटाइटिस बी-सी, सेप्टीसीमिया जैसे संक्रामक रोगों के मरीजों के अलावा 18 साल से अधिक का कोई भी व्यक्ति मृत्यु के बाद कार्निया दान कर सकता है।
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